Essay On Gender Inequality In Hindi Language

क्या आप लड़का लड़की एक समान पर निबंध लिखना चाहते हैं?
क्या आप बेटा बेटी एक समान के बारे में जानना चाहते हैं?

आइए जानते हैं लड़का लड़की एक समान पर वाद विवाद को विस्तार से| आइए जानते हैं लिंग असमानता एक कलंक के बारे में|

लड़का लड़की एक समान पर निबंध (In Hindi) Pdf: (Gender Inequality Essay in Hindi PDF)

हमारे समाज में दो जाति के इंसान रहते हैं-लड़का और लड़की| समाज के गठन में ये दोनों किरदारों की बड़ी एहेमियत है| लड़का और लड़की सामाजिक व कानूनी रूप से एक जैसे हैं| एक बेहतर समाज बनाने के लिए लड़कों की उतनी ही जरुरत होती है जितनी की लड़कियों की| लेकिन एक बेहतर समाज की गठन में बेहतर सोच रखने वाले इंसानों की काफी ज्यादा जरुरत रहती है| सोच लड़का और लड़की को एक मानने की |

हमारे इस आर्टिकल (लड़का लड़की एक समान पर निबंध In Hindi) विद्द्यार्थियों के लिए काफी मददगार है| इस आर्टिकल से विद्द्यार्थियों लड़का और लड़की एक समान पर हिंदी निबंध भी लिख सकते हैं| ये लड़का और लड़की एक समान पर निबंध है|

लड़का लड़की एक समान पर निबंध:Gender Inequality Essay in Hindi:

दोस्तों, निचे नीले रंग में दिया हुआ अंश “लड़का लड़की एक समान या बेटा बेटी एक समान” पर निबंध है| इसे आप ज्यों का त्यों अपने भाषण और निबंध में इस्तेमाल करें| इस विषय में अधिक जानकारी के लिए नीले अंश में निचे भारत में लिंग असमानता पर कई रोचक तथ्य दिए गए हैं| उन्हें पढना मत भूलिए|

आज के इस मॉडर्न युग में लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं है| दोनों ही एक दुसरे को कांटे की टक्कर देने में सक्षम हैं| इतिहास से लेकर आज तक लडकियां कई खेत्र में सफलता हाषिल की हैं| लड़कियों की कर्मशीलता ही उनके सक्षम होने का सबूत है| आज भी लडकियां समाज की शान माने जाते हैं| लेकिन आए दिन लड़कियों पर अत्याचार, घरेलु हिंसा, दहेज की मांग हमे शर्मशार कर जाती है| हमे लड़कियों और लड़कों में कोई भेदभाव न कर सब को एक समान महसूस करना चाहिए|

लड़कियों को उचित शिक्षा देना चाहिए| उन्हें पढने का मौका देना चाहिए| वक़्त ने लड़कियों पर जुर्म होते देखा है, लेकिन वह दौर फिर से न दोहराया जाये इसकी हमें ख़ास ध्यान रखना है| आज कल सरकार के तरफ से लड़कियों के लिए काफी नई और सुविजनक योजनाओं का एलान किया जा रहा है| लड़कियों के जन्म से लेकर पढ़ाई, नौकरी, बीमा, कारोबार, सरकारी सुवीधा, आदि क्षेत्र में सरकार की तरफ से काफी मदद भी प्रदान किया जा रहा है, ताकि लडकियां समाज में कभी किसी से पीछे न छूट जाएँ|

वक़्त लड़कियों को घर के चार दिवारी में सिमित रहने से लेकर आज आसमान में उड़ान करने की गवाह है| ये सब मुमकिन हमारी खुली सोच और निस्वार्थ ख्याल से है|

लड़कियों को अपनी नज़रिए पेश करने की आजादी मिलनी चाहिए| उन्हें परिवार की हर निर्णय का हिस्सा बनने देना चाहिए| उन्हें अपने आप को कभी किसी से कम महसूस नहीं करना चाहिए|
लड़कियों को आत्मरक्षा की तालीम दे हम उन्हें समाज की गन्दगी से लढने की योग्य बनाना चाहिये| हमें उन्हें अपने आपको सुरक्षित महसूस कराना चाहिए|

लड़का और लड़की एक समान की कोशिश की पहल सबसे पहले हमें अपने परिवार से शुरुवात करनी चाहिये| अपने बच्चों को लड़कियों का आदर करना सिखाना चाहिए| हमेशा लड़कियों की सम्मान कर उनकी मदद करने की शिक्षा देना चाहिए| हमें खुद सबसे पहले अपने बेटों और बेटियों के बीच कोई अंतर नहीं करना चाहिए| हमे ये ध्यान रखना चाहिए की कहीं हमारे समाज में कोई परिवार में लड़कियों पर अत्याचार तो नहीं हो रहे हैं| और अगर ऐसी कोई समस्या देखने को मिले, तो तुरंत दोषी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए|

विद्द्यालयों में लड़का और लड़की एक समान या कहें बेटा बेटी एक समान के बारे में पढाया जा रहा है ताकि ये मनोभाव बच्चों पर शुरुवात से ही छाप छोड़ जाए की लडकियां और लड़कों में कोई अंतर नहीं है| दोनों एक समान है| और दोनों को ही अगर सही मौका या आजादी दिया जाए तो कुछ कर सकते हैं|

अगर देखा जाये तो पहले की ज़माने से लड़कियों पर कई हद तक पाबंदी हटा दिया गया है, लेकिन हमे इस पाबंदी को हटाने से ज्यादा मिटाने के बारे में सोचना चाहिए| किसी भी हाल में लड़कियों को अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने देना चाहिए| ये हम ही हैं जो की लड़का और लड़की में अंतर का भाव बनाये हैं वरना इश्वर ने तो सिर्फ इंसान बनाये थे|

वक़्त आ गया है लड़का लड़की में अंतर जैसे दक्क्यानुसी सोच को समाज से बाहर फेंकने की और हमारे समाज की बहु बेटियों को उनके पुरे हक देने की| आईए आज से ये संकल्प करें की लड़का और लड़की में हम अब से कोई भेदभाव न करें और लड़कियों को उनका पूरा हक देने से न हिचकिचाएं| हम अपने सोच को बदल कर देश की हालत को बदल सकते हैं| हममे ही है देश और हममे ही है उसका भविष्य| आइए लड़कियों को उनकी हक दे कर देश की भविष्य को और उज्जवल बनाएं|

                                                                                    धन्यवाद !!

क्या लड़का और लड़की को एक माना जाता है?

हमारे समाज में देवी की जितनी पूजा किया जाता है, उतनी ही उपेक्षा घर में बेटीयों की होती है | बेटा का जन्म  हो जाये तो घर में खुसी का माहौल बन जाता है लेकिन एक लड़की की जन्म होते ही कई परिवारों में दुःख का वातावरण बन जाता है|

हम समाज वाले भी काफी चालाकी से मंदिर में देवियों की पुजा करते हैं और घरों में लड़कियों पर अत्याचार, शारीरिक और मानसिक दर्द देकर अपने मर्द होने का सबूत सजाते हैं |  दहेज प्रथा (पढ़िए दहेज प्रथा पर निबंध) जैसे प्रथाओं की सख्ती से पालन करते हैं और बाहर लड़का लड़की एक समान के नारे गाते हैं| आज भी हमारे समाज ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जो कि लड़कियों या औरतों पर अत्याचार करते हैं, उन्हें हमेशा अपने से कम मानते हैं | कन्या भ्रूण हत्या (पढ़िए कन्या भ्रूण हत्या पर निबंध) जैसे शर्मसार काम को अंजाम देते हैं|

असल जिंदगी में लडकियां लड़कों से कम नहीं है| बस जरुरत है तो लड़कियों की सोच पर आजादी देने की| हम जब तक लड़कियों की सपनो और सोच को अनदेखा करेंगे, तब तक लड़का और लड़की एक समान पर बहस जारी रहेगा| और न जाने कितने ही मासूम लड़कियों की इच्छाओं का गला घोटा जायेगा |

लडकियां लड़कों से कम क्यूँ नहीं हैं? 

आज की नई सोच वाले जमाना पहले जैसे नहीं रहा जहाँ लड़कियों को खाली घर कि काम करने तक ही सिमित माना जाता था| आज देश की महिलाएं घर के साथ साथ बाहर का काम भी बहोत खूब निभाते हैं| लड़कों को लड़कियां बराबरी के टक्कर दे रहे हैं| लडकियां देश की हर क्षेत्र में अपनी अलग सी स्थान हाशिल करने में सक्षम हो रही हैं |

इतिहास लड़कियों की क्षमता की गवाह है| लड़कियों को भी अगर सही अवसर मिले तो वह भी अपने नाम गर्व से रोशन कर सकते हैं| जो लोग लड़कियों को लड़कों के बराबर नहीं समझते, वह लोग ही कई सामजिक अत्याचारों को पैदा करते हैं|

समाज लड़कों को ज्यादा महत्व क्यूँ देता है?

हर समाज में लड़कों को लड़कियों से ज्यादा महत्व मिल रहा  है| लड़कों को लड़कियों से ज्यादा कर्मशील माना जाता है| इस प्रकार की सोच के पीछे भी कई कारण हैं:

  • कई परिवारों में ये माना जाता है की लड़का ही कमाई कर सकता है और अपने परिवार की जिम्मेदारी उठा सकता है |
  • लड़कियों को घर की चार दीवारों में ही रखने की सोच से भी लड़का और लड़की में अंतर बनता है|
  • लडकियां लड़कों की बराबरी नही कर सकते जैसी सोच लड़कियों को पीछे रख देती है|
  • शदियों से लड़कों को समाज का प्रधान समझने के कारण लडकियां अपनी इच्छाओं को कभी पूरा नहीं कर पाति |

लड़कियों पर समाज की सोच कैसी है?

समाज के लगभग हर श्रेणी के लोग लड़कियों को लड़कों के पूरी तरह बराबर नहीं मानते हैं| आज भी कुछ लोग ये सोचते हैं की लड़कियां घर की काम के लिए बने हैं और उनका बाहर की दुनिया से कोई मतलब नहीं  है | लड़कियां लड़कों को कभी मात नहीं दे सकती वाली सोच ही लड़कियों को कई बार अपने ताकत की सबूत दिखाने से रोक देती है |

आज भी समाज में लडकियों की कौशलता पर सवाल उठाये जाते हैं| उनकी आजादी पर कई तरह की रोक लगाई जाती है जो की उनकी सपनोँ की आगे आड़ बन जाते हैं| जरुरत है लड़कियों की सपनों और फैसलों की आदर करने की| उन्हें भी घर के लड़कों जैसी दर्ज़ा मिलनी चाहिए|

हमे ये पता होता है की लडकियां लड़कों से कम नहीं हैं, इस बात की हम कई बार जिक्र भी करते हैं, लेकिन असल जिंदगी में इसका प्रयोग करने से कई बार हिचकिचाते हैं |

“लड़का लडकी एक समान” ये सोच कैसे साबित करें और समाज में बदलाव कैसे लाएंगे?

लडका और लड़की दोनों एक हैं, ये साबित करने के लिए हमे अपने समाज में कई तरह के बदलाव लाना पड़ेगा| बदलाव समाज की सोच की| आज कल लडकियां लड़कों  को पूरी टक्कर दिए आगे बढ़ रहे हैं| फिर भी हमारी समाज कन्या भ्रूण हत्या को अपनाने से नहीं बचती|

हमे अपनी सोच को बदलना होगा| लड़कियों को लड़कों से कम नहीं समझना है| लड़कियों को अपने सपने पुरे करने की पूरी तरह आजादी देना होगा| उन्हें समझने होगा| उनके सपनो को पूरा करने के लिए हमे उनकी मदद करना चाहिए|

हमें लड़का और लड़की एक समान साबित करने के लिए अनेक बदलाव लाने होंगे| जैसे की-

लड़का और लड़की एक समान: इसकी शुरुवात पारिवारिक स्थर से करनी चाहिए-

लड़का और लड़की एक समान का सोच समाज में लाने के लिए हमे सबसे पहले शुरुवात अपने परिवार से करनी चाहिए| हमे अपने बच्चों और छोटे छोटे भाई बहनों को बताना होगा की लड़का और लड़की में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता| लडकियां लड़कों से कम नही हैं| लडकियां लड़कों जैसी हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने में सक्षम  हैं|

लड़कियों को लड़कों जैसे समान अधिकार देना चाहिए:

जिस समाज में ज्ञान की देवी ही औरत जात है, उस समाज में हम लड़कियों को शिक्षा से कैसे बंचित रख सकते हैं?  हमे लड़कों और लड़कियों में कोई सामाजिक  भेद-भाव नहीं रखना चाहिए| हमे लड़कियों को लड़कों जैसी समान अधिकार देना चाहिए | लड़कियों को भी शिक्षा की पूरी अधिकार देकर उन्हें अपने आप को शाबित करने का मौका देना चाहिए |

कहते हैं की एक नारि के शिक्षित होने से पूरा परिवार शिक्षित होता है | वह अपने परिवार वालों की सहारा बन जाती है| हमने अक्सर लड़कियों को अपने परिवार कि पुरी जिम्मेदारी उठाते देखा है | बस जरुरत है तो लड़कियों को भी पढने और बढ़ने का मौका देने की|

हमे महिला शसक्तिकरण की महत्व:

महिला किसी भी समाज की वह हिस्सा हैं जिनके बिना समाज की बढ़ना और गढ़ना दोनों अधुरा रह जाता है | हमारे देश में  हमने ये तो देखा और सुना ही है की वह लडकियां ही है जिन पर जुर्म का नाच नचाया जाता है|

हम बेशक ये कहते हैं की महिलाओं को समाज मे एक मजबूत और निडर किरदार मिलना चाहिए| लेकिन ये तभी मुमकिन हो सकता है जब पुरे समाज इसके लिए ढृढ़ संकल्प ले|

हम आये दिन ये सुनते हैं की महिलाओं पर दिन भर दिन अत्याचार बढ़ते हैं| नारि शक्ति और महिला शसक्तीकरण की मुहिम बस एक मुहीम बनकर रह गए हैं| लेकिन अब वक़्त आ गया है की हमें महिला शसक्तीकरण पर जोर देना चाहिए| हमें महिलाओं की इच्छाओं और फैसलों का आदर करना चाहिए| महिलाओं पर अत्याचार के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करना चाहिए| महिलाओं की हक की क़ानून को और कड़ी से पालन करना चाहिए | हर महिला की इज्ज़त करके उन्हें एक बेख़ौफ़ जिंदगी जीने देना चाहिए |

समाज के सभी क्षेत्रों में पुरुष और महिला दोनों को बराबरी में लाना होगा| इसके लिए महिला शसक्तिकरण बेहद जरुरी है| पंडित जवाहरलाल नेहररु ने महिला शसक्तिकरण के बारे में कहा था की-

लोगों को जगाने के लिए महिलाओं को जागृत होना जरुरी है |

महिलाएं जब ढृढ़ संकल्प लिए कुछ करने की सोचती हैं तो वह अपने साथ साथ पुरे समाज व देश को आगे लेती हैं | समाज से कुछ कुविचार जैसे की- दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, लड़का लड़की मे अंतर, महिलाओं पर घरेलु हिंसा, योण शोषn को मिटाने से ही महिला शसक्तिकरण का उपयोग किया जा सकता है |

लड़कियों की सफल प्रयत्नों: इतिहास में शसक्त महिलाओं की उदाहरण:

इतिहास से लेकर आज तक वक़्त ने लड़कियों को सफलता के झंडे गाड़ते देखा है| हमारे देश की कई बेटियों ने इतिहास रचा है |देश की बेटियाँ कई क्षेत्र में देश की गौरव बन के हम सब के लिए प्रेरणादायक बन चुकी हैं | अगर हम इतिहास की पन्नों को झाँक कर देखें तो हमें कल्पना चावला, रानी लक्ष्मी बाई, इंदिरा गाँधी, जैसे हस्तियों की कहानी आज भी हमें साहस और ताकत देती हैं |

कल्पना चावला अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय महिला थी| उनकी कुछ करने की सोच आज भी उन्हें हमारे दिल में जिन्दा रखी है | कल्पना चावला निश्चित आज की लड़कियों के लिए एक आदर्श है| आज की हर लड़कियों पर ये प्रेरणादायक ख्याल तो जरुर ही आया होगा की “जब कल्पना चावला जैसी एक मध्य वर्गीय परिवार की औरत देश कि नाम रोशन कर सकती है तो में क्यूँ नहीं”|

रानी लक्ष्मी बाई की कहानी तो हम सब के लिए प्रेरणादायाक है| उनकी वीरता और साहस आज भी हमें ये सिखाती है की सत्य ही जीत है और डर के जीने से भला है मर जाना| उनकी अटूट साहस की कोई तुलना ही नहीं है|

इंदिरा गाँधी जी ने लगातार 3 बार देश कि प्रधान्मंत्री बन के ये साबित कर दिया की लड़कियां लड्कों से किसी भी तरह से कमजोर नही है| उनकी वीरता की आज भी मिशाल दिया जाता है | उनकी तेज दिमाग और अटूट फैसले लेने की क्षमता राजनीति मेंएक छाप छोड़ गयी|

अगर इतिहास की पन्नो को पलटा जाए तो हमे अनगिनत लड़कियों की नाम मीलेगा जो की अपने महान काम से देश या अपने समाज के नाम को गौरव की हैं|

लड़का लड़की एक समान के मुद्दे पर सरकारी प्रयत्नों:

हमारे देश की सरकार भी लड़कियों को लडकों के बराबर महसूस कराने के लिए काफी कदम उठाये हैं| सरकार ने लड़कियों के लिए हर क्षेत्र में अवसर दिए हैं| स्कूलों से लेकर नौकरी, बीमा, जमीन या व्यापार की मालिकाना जैसी क्षेत्रों में सरकार ने लड़कियों की साथ देकर देश कि लड़कियों की होंसला बढ़ाया है |

लड़कियों पर अत्याचार के लिए भी देश कि क़ानून में कई तरह के दंडों का इंतजाम किया गया है| दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या जैसी प्रथाओं के खिलाफ अब पहले से काफी सख्ती हो गई है|

लड़कियों को पढ़ाई से लेकर जिंदगी के कई अहम् मोड़ के लिए सरकार ने सब्सिडी का भी व्यवस्था किया है, जैसे की गरीब बेटियों की शादी के लिए मदद, पढाई के दौरान मूफ्त शिक्षा और मुफ्त किताबों का ईंतजाम| कई राज्यों में शादी के बाद बेटी पैदा होने पर भी आर्थिक मदद दिया जाता है|

आज कल सरकार बेटियों कि पक्ष को मजबूत बनाने के लिए हर उचित कदम उठा रही है | मकसद लड़कियों को लड़कों की बराबरी कराने की, जो की एक स्वस्थ समाज की गठन के लिए बहूत अहम् है|

Conclusion: लड़का लड़की एक समान पर अंतिम चर्चा

हमारे समाज की कई वर्गों कि लोगों मे आज भी ये सोच है कि लड़कियां कहीं न कहीं लड़कों से पीछे हैं| वक़्त आ गया है ऐसे लोगों को पलट के जवाब देने का |लडकियां लड़कों के बराबर है, बस जरुरत है तो हमे अपनी सोच बदलने की| लड़कियों को हर क्षेत्र में मौका देना चाहिए अपनी स्थान बनाने की| हमे लड़कियों की फैसलों और सोच की आदर करना चाहिए और उन्हें अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने देना चाहिए|

अगर :लड़का लड़की एक समान” की विषय में आपकी कोई राय है तो हमे निचे कमेंट बॉक्स में जरुर बताएं ताकि आपकी सोच को हम अपने इस आर्टिकल के जरिये पुरे देश के सामने रख पायें| आपकी कमेंट्स और सुझाव हमें ऐसे ही सामाजिक विषयों में लिखने के लिए उत्साहित करती है| इस आर्टिकल को जितनी हो सके उतनी ही अपने दोस्तों में शेयर करें|

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हम 21वीं शताब्दी के भारतीय होने पर गर्व करते हैं जो एक बेटा पैदा होने पर खुशी का जश्न मनाते हैं और यदि एक बेटी का जन्म हो जाये तो शान्त हो जाते हैं यहाँ तक कि कोई भी जश्न नहीं मनाने का नियम बनाया गया हैं। लड़के के लिये इतना ज्यादा प्यार कि लड़कों के जन्म की चाह में हम प्राचीन काल से ही लड़कियों को जन्म के समय या जन्म से पहले ही मारते आ रहे हैं, यदि सौभाग्य से वो नहीं मारी जाती तो हम जीवनभर उनके साथ भेदभाव के अनेक तरीके ढूँढ लेते हैं। हांलाकि, हमारे धार्मिक विचार औरत को देवी का स्वरुप मानते हैं लेकिन हम उसे एक इंसान के रुप में पहचानने से ही मना कर देते हैं। हम देवी की पूजा करते हैं, पर लड़कियों का शोषण करते हैं। जहाँ तक कि महिलाओं के संबंध में हमारे दृष्टिकोण का सवाल हैं तो हम दोहरे-मानकों का एक ऐसा समाज हैं जहाँ हमारे विचार और उपदेश हमारे कार्यों से अलग हैं। चलों लिंग असमानता की घटना को समझने का प्रयास करते हैं और कुछ समाधानों खोजते हैं।

लैंगिक असमानता की परिभाषा और संकल्पना

‘लिंग’ सामाजिक-सांस्कृतिक शब्द हैं, सामाजिक परिभाषा से संबंधित करते हुये समाज में ‘पुरुषों’ और ‘महिलाओं’ के कार्यों और व्यवहारों को परिभाषित करता हैं, जबकि, 'सेक्स' शब्द ‘आदमी’ और ‘औरत’ को परिभाषित करता है जो एक जैविक और शारीरिक घटना है। अपने सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहलुओं में, लिंग पुरुष और महिलाओं के बीच शक्ति के कार्य के संबंध हैं जहाँ पुरुष को महिला से श्रेंष्ठ माना जाता हैं। इस तरह, ‘लिंग’ को मानव निर्मित सिद्धान्त समझना चाहिये, जबकि ‘सेक्स’ मानव की प्राकृतिक या जैविक विशेषता हैं।

लिंग असमानता को सामान्य शब्दों में इस तरह परिभाषित किया जा सकता हैं कि, लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव। समाज में परम्परागत रुप से महिलाओं को कमजोर जाति-वर्ग के रुप में माना जाता हैं। वह पुरुषों की एक अधीनस्थ स्थिति में होती है। वो घर और समाज दोनों में शोषित, अपमानित, अक्रमित और भेद-भाव से पीड़ित होती हैं। महिलाओं के खिलाफ भेदभाव का ये अजीब प्रकार दुनिया में हर जगह प्रचलित है और भारतीय समाज में तो बहुत अधिक है।

भारत में लैंगिक असमानता के कारण और प्रकार

भारतीय समाज में लिंग असमानता का मूल कारण इसकी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में निहित है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिल्विया वाल्बे के अनुसार, “पितृसत्तात्मकता सामाजिक संरचना की ऐसी प्रक्रिया और व्यवस्था हैं, जिसमें आदमी औरत पर अपना प्रभुत्व जमाता हैं, उसका दमन करता हैं और उसका शोषण करता हैं।” महिलाओं का शोषण भारतीय समाज की सदियों पुरानी सांस्कृतिक घटना है। पितृसत्तात्मकता व्यवस्था ने अपनी वैधता और स्वीकृति हमारे धार्मिक विश्वासों, चाहे वो हिन्दू, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म से ही क्यों न हों, से प्राप्त की हैं।

उदाहरण के लिये, प्राचीन भारतीय हिन्दू कानून के निर्माता मनु के अनुसार, “ऐसा माना जाता हैं कि औरत को अपने बाल्यकाल में पिता के अधीन, शादी के बाद पति के अधीन और अपनी वृद्धावस्था या विधवा होने के बाद अपने पुत्र के अधीन रहना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में उसे खुद को स्वतंत्र रहने की अनुमति नहीं हैं।”

मनु द्वारा महिलाओं के लिये ऊपर वर्णित स्थिति आज के आधुनिक समाज की संरचना में भी मान्य हैं। यदि यहाँ-वहाँ के कुछ अपवादों को छोड़ दे तो महिलाओं को घर में या घर के बाहर समाज या दुनिया में स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय लेने की कोई शक्ति नहीं मिली हैं।

मुस्लिमों में भी समान स्थिति हैं और वहाँ भी भेदभाव या परतंत्रता के लिए मंजूरी धार्मिक ग्रंथों और इस्लामी परंपराओं द्वारा प्रदान की जाती है। इसीस तरह अन्य धार्मिक मान्याताओं में भी महिलाओं के साथ एक ही प्रकार से या अलग तरीके से भेदभाव हो रहा हैं।

हमारे समाज में लैंगिक असमानता की दुर्भाग्यपूर्ण बात भी महिलाएँ है, प्रचलित सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों के कारण उन्होंने पुरुषों के अधीन अपनी स्थिति को स्वीकार कर लिया हैं और वो भी इस समान पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अंग हैं।

महिलाओं के समाज में निचला स्तर होने के कुछ कारणों में से अत्यधिक गरीबी और शिक्षा की कमी भी हैं। गरीबी और शिक्षा की कमी के कारण बहुत सी महिलाएं कम वेतन पर घरेलू कार्य करने, संगठित वैश्यावृति का कार्य करने या प्रवासी मजदूरों के रुप में कार्य करने के लिये मजबूर होती हैं। महिलाओं को न केवल असमान वेतन या अधिक कार्य कराया जाता हैं बल्कि उनके लिये कम कौशल की नौकरियाँ पेश की जाती हैं जिनका वेतनमान बहुत कम होता हैं। यह लिंग के आधार पर असमानता का एक प्रमुख रूप बन गया है।

लड़की को बचपन से शिक्षित करना अभी भी एक बुरा निवेश माना जाता हैं क्योंकि एक दिन उसकी शादी होगी और उसे पिता के घर को छोड़कर दूसरे घर जाना पड़ेगा। इसलिये, अच्छी शिक्षा के अभाव में वर्तमान में नौकरियों कौशल माँग की शर्तों को पूरा करने में असक्षम हो जाती हैं, वहीं प्रत्येक साल हाई स्कूल और इंटर मीडिएट में लड़कियों का परिणाम लड़कों से अच्छा होता हैं। ये प्रदर्शित करता हैं कि 12वीं कक्षा के बाद माता-पिता लड़कियों की शिक्षा पर ज्यादा खर्च नहीं करते जिससे कि वो नौकरी प्राप्त करने के क्षेत्र में पिछड़ रही हैं।

सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, परिवार, खाना की आदतों के मामले में भी, वो केवल लड़का ही होता जिसे सभी प्रकार का पोष्टिक और स्वादिष्ट पसंदिदा भोजन प्राप्त होता हैं जबकि लड़की को वो सभी चीजें खाने को मिलती हैं जो परिवार के पुरुष खाना खाने के बाद बचा देते हैं जो दोनों ही रुपों गुणवत्ता और पोष्टिकता में बहुत ही घटिया किस्म का होता हैं और यही बाद के वर्षों में उसकी खराब सेहत का प्रमुख कारण बनता हैं। महिलाओं में रक्त की कमी के कारण होने वाली बीमारी एनिमीया (अरक्त्ता) और बच्चों को जन्म देने के समय होने वाली परेशानियों का प्रमुख कारण घटिया किस्म का खाना होता हैं जो इन्हें अपने पिता के घर और ससुराल दोनों जगह मिलता हैं इसके साथ ही असह्याय काम का बोझ जिसे वो बचपन से ढोती आ रही हैं।

अतः उपर्युक्त विवेचन के आझार पर कहा जा सकता हैं कि महिलाओं के साथ असमानता और भेदभाव का व्यवहार समाज में, घर में, और घर के बाहर विभिन्न स्तरों पर किया जाता हैं।

 

भारत में लैंगिक असमानता का महत्वपूर्ण डेटा:

वैश्विक सूचकांक:

लैंगिक असमानता भारत की विभिन्न वैश्विक लिंग सूचकांकों में खराब रैंकिंग को प्रदर्शित करती हैं।

  • यूएनडीपी के लिंग असमानता सूचकांक - 2014: 152 देशों की सूची में भारत की स्थिति 127वें स्थान पर हैं। सार्क देशों से संबंधित देशों में केवल अफगानिस्तान हि इन देशों की सूची में ऊपर हैं।
  • विश्व आर्थिक मंच के वैश्विक लिंग अंतराल सूचकांक - 2014: विश्व के 142 देशों की सूची में भारत 114वें स्थान पर हैं। ये सूचकांक में चार प्रमुख क्षेत्रों में लैंगिक अंतर की जाँच करता हैं:
  • आर्थिक भागीदारी और अवसर।
  • शैक्षिक उपलब्धियाँ।
  • स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा।
  • राजनीतिक सशक्तिकरण।

इन सभी सूचकाकों के अन्तर्गत भारत की स्थिति इस प्रकार हैं:

  • आर्थिक भागीदारी और अवसर – 134।
  • शैक्षिक उपलब्धियाँ – 126।
  • स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा – 141।
  • राजनीतिक सशक्तिकरण – 15।

ये दोनों वैश्विक सूचकांक लिंग समानता के क्षेत्र में भारतकी खेद जनक स्थिति को प्रदर्शित करते हैं। बस केवल राजनीतिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में भारत की कार्य सराहनीय हैं लेकिन अन्य सूचकाकों में इसकी स्थिति बहुत खेदजनक हैं और इस स्थिति में सुधार करने के लिये बहुत अधिक प्रयास करने की जरुरत हैं।

लैंगिक असमानता सांख्यिकी

लिंग असमानता विभिन्न तरीकों में प्रकट होता है और भारत में जो सूचकांक सबसे अधिक चिन्ता का विषय हैं वो निम्न हैं:

  • कन्या भ्रूण हत्या
  • कन्या बाल-हत्या
  • बच्चों का लिंग अनुपात (0 से 6 वर्ग): 919
  • लिंग अनुपात: 943
  • महिला साक्षरता: 46%
  • मातृ मृत्यु दर: 1,00,000 जीवित जन्मों प्रति 178 लोगों की मृत्यु।

ये ऊपर वर्णित सभी महत्वपूर्ण सूचकांक में से कुछ सूचकांक हैं जो देश में महिलाओं की स्थिति को प्रदर्शित करते हैं।

कन्याभ्रूण हत्या और बाल-कन्या हत्या सबसे अमानवीय कार्य हैं और ये बहुत शर्मनाक हैं कि ये सभी प्रथाएं भारत में बड़े पैमाने पर प्रचलित हैं।

ये आँकड़े प्रदर्शित करते हैं कि कानूनों अथार्त् प्रसव-पूर्व निदान की तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग निवारण) अधिनियम 1994, के बावजूद आज भी लिंग परीक्षण के बाद गर्भपात अपने उच्च स्तर पर हैं। मैकफर्सन द्वारा किये गये एक शोध के आँकड़े प्रदर्शित करते हैं कि भारत में लगभग 1,00,000 अवैध गर्भपात हर साल केवल इसलिये कराये जाते हैं क्योंकि गर्भ में पल रहा भ्रूण लड़की का भ्रूण होता हैं।

इसके कारण, 2011 की जनगणना के दौरान एक खतरनाक प्रवृत्ति की सूचना सामने आयी कि बाल-लिंग अनुपात (0 से 6 साल की आयु वर्ग वाले बच्चों का लिंग-अनुपात) 919 हैं जो पिछली जनगणना 2001 से 8 अंक कम था। ये आँकड़े प्रदर्शित करते हैं कि लिंग परीक्षण के बाद गर्भपातों की संख्या में वृद्धि हुई हैं।

 

जहाँ तक पूरे लिंग-अनुपात की बात हैं, 2011 की जनगणना के दौरान ये 943 था जो 2001 की 933 की तुलना में 10 अंक आगे बढ़ा हैं। यद्यपि ये एक अच्छा संकेत हैं कि पूरे लिंग-अनुपात में वृद्धि हुई हैं लेकिन ये अभी भी पूरी तरह से महिलाओं के पक्ष में नहीं हैं।

2011 के अनुसार पुरुषों की 82.14% साक्षरता की तुलना में महिला साक्षरता 65.46% हैं। ये अन्तराल भारत में महिलाओं के साथ व्यापक असमानता को प्रदर्शित करता हैं साथ ही ये भी इंगित करता हैं कि भारतीय महिलाओं की शिक्षा की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे हैं।

ये सभी संकेतक लिंग समानता और महिलाओं के मूलभूत अधिकारों की ओर से भारत की निराजनक स्थिति को प्रदर्शित करते हैं। इसलिये प्रत्येक साल भारतीय सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिये विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करती हैं ताकि इनका लाभ महिलाओं को प्राप्त हो लेकिन जमीनी हकीकत ये कि इतने कार्यक्रमों के लागू किये जाने के बाद भी महिलाओं की स्थिति में कोई खास परिवर्तन नजर नहीं आता। ये परिवर्तन तभी दिखायी देंगें जब समाज में लोगों के मन में पहले से बैठे हुये विचार और रुढ़िवादिता को बदला जायेगा, जब समाज खुद लड़के और लड़कियों में कोई फर्क नहीं करेगा और लड़कियों को कोई बोझ नहीं समझेगा।

लैंगिक असमानता के खिलाफ कानूनी और संवैधानिक सुरक्षा उपाय

लिंग असमानता को दूर करने के लिये भारतीय संविधान ने अनेक सकारात्मक कदम उठाये हैं; संविधान की प्रस्तावना हर किसी के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करने के लक्ष्यों के साथ ही अपने सभी नागरिकों के लिए स्तर की समानता और अवसर प्रदान करने के बारे में बात करती है। इसी क्रम में महिलाओं को भी वोट डालने का अधिकार प्राप्त हैं। संविधान का अनुच्छेद 15 भी लिंग, धर्म, जाति और जन्म स्थान पर अलग होने के आधार पर किये जाने वाले सभी भेदभावों को निषेध करता हैं। अनुच्छेद 15(3) किसी भी राज्य को बच्चों और महिलाओं के लिये विशेष प्रावधान बनाने के लिये अधिकारित करता हैं। इसके अलावा, राज्य के नीति निदेशक तत्व भी ऐसे बहुत से प्रावधानों को प्रदान करता हैं जो महिलाओं की सुरक्षा और भेदभाव से रक्षा करने में मदद करता हैं।

इन संवैधानिक सुरक्षा उपायों के अलावा, विभिन्न सुरक्षात्मक विधान भी महिलाओं के शोषण को खत्म करने और समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा देने के लिए संसद द्वारा पारित किये गये है। उदाहरण के लिये, सती प्रथा उन्मूलन अधिनियम 1987 के अन्तर्गत सती प्रथा को समाप्त करने के साथ ही इस अमानवीयकृत कार्य को दंड़नीय अपराध बनाया गया। दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, दहेज की प्रथा को खत्म करने के लिए; विशेष विवाह अधिनियम, 1954 अंतर्जातीय या अंतर-धर्म से शादी करने वाले विवाहित जोड़ों के विवाह को सही दर्जा देने के लिए; प्रसव पूर्व निदान तकनीक (विनियमन और दुरूपयोग निवारण) विधेयक (कन्या भ्रूण हत्या और कई और इस तरह के कृत्यों को रोकने के लिए 1991 में संसद में पेश किया गया, 1994 में पारित किया है।) इलके अलावा संसद समय-समय पर समाज की बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार लागू नियमों में महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुये बहुत से सुधार करती रहती हैं, उदाहरण के लिये, भारतीय दंड संहिता 1860 में धारा 304- बी. को दहेज-केस दुल्हन की मृत्यु या दुल्हन को जलाकर मार देने के कुकृत्य को विशेष अपराध बनाकर आजीवन कारावास का दंड़ देने का प्रावधान किया गया हैं।

भारत में महिलाओं के लिये बहुत से संवैधानिक सुरक्षात्मक उपाय बनाये हैं पर जमीनी हकीकत इससे बहुत अलग हैं। इन सभी प्रावधानों के बावजूद देश में महिलाएं के साथ आज भी द्वितीय श्रेणी के नागरिक के रुप में व्यवहार किया जाता हैं, पुरुष उन्हें अपनी कामुक इच्छाओं की पूर्ति करने का माध्यम मानते हैं, महिलाओं के साथ अत्याचार अपने खतरनाक स्तर पर हैं, दहेज प्रथा आज भी प्रचलन में हैं, कन्या भ्रूण हत्या हमारे घरों में एक आदर्श है।

हम लैंगिक असमानता कैसे समाप्त कर सकते हैं

संवैधानिक सूची के साथ-साथ सभी प्रकार के भेदभाव या असमानताएं चलती रहेंगी लेकिन वास्तिविक बदलाव तो तभी संभव हैं जब पुरुषों की सोच को बदला जाये। ये सोच जब बदलेगी तब मानवता का एक प्रकार पुरुष महिला के साथ समानता का व्यवहार करना शुरु कर दे न कि उन्हें अपना अधीनस्थ समझे। यहाँ तक कि सिर्फ आदमियों को ही नहीं बल्कि महिलाओं को भी औज की संस्कृति के अनुसार अपनी पुरानी रुढ़िवादी सोच बदलनी होगी और जानना होगा कि वो भी इस शोषणकारी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का एक अंग बन गयी हैं और पुरुषों को खुद पर हावी होने में सहायता कर रहीं हैं।

इसलिए, महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता हैं, जहाँ महिलाएं आर्थिक रुप से स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बन सकती हैं, जहाँ वो अपने डर से लड़कर दुनिया में भयमुक्त होकर जा सकती हैं, जहाँ वो अपने अधिकारों को पुरुषों की जेब में से निकाल सकती हैं और इसके लिये उन्हें किसी से पूछने की भी आवश्यकता नहीं हैं, जहाँ वो अच्छी शिक्षा प्राप्त करके अच्छा भविष्य व अपनी सम्पति की स्वंय मालिक बन सकती हैं और इन सबसे से भी ऊपर उन्हें मनु के समय से लगाई गयी सीमाओं से बाहर निकलकर चुनाव करने व अपने निर्णय खुद लेने की स्वतंत्रता मिलती हैं।

हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हमारा सहभागी लोकतंत्र, आने वाले समय में और पुरुषों और महिलाओं के सामूहिक प्रयासों से लिंग असमानता की समस्या का समाधान ढूँढने में सक्षम हो जायेंगा और हम सभी को सोच व कार्यों की वास्तविकता के साथ में सपने में पोषित आधुनिक समाज की और ले जायेगा।

 

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